अथातो धर्म जिज्ञासा
भारत सदैव से एक ज्ञान-केन्द्रित सभ्यता रहा है, जहाँ सत्य की खोज की परंपरा नासदीय सूक्त के गहन प्रश्नों से आरम्भ होकर “नेति-नेति” की निरंतर जिज्ञासा तक प्रवाहित होती रही है, जो समझ की ओर उन्मुख एक अविराम बौद्धिक यात्रा का परिचायक है। इस सभ्यता के मूल में “वसुधैव कुटुम्बकम्” की वह दृष्टि निहित है, जिसमें समस्त विश्व को एक परिवार के रूप में देखा गया है और जहाँ कोई भी “अन्य” नहीं माना जाता।
इस सभ्यतागत संरचना का विकास तीन परस्पर सम्बद्ध स्तम्भों पर आधारित रहा है—सांस्कृतिक संरक्षण हेतु शस्त्र, लौकिक एवं वैचारिक ज्ञान की सम्यक् समझ के लिए शास्त्र, तथा अर्जित ज्ञान को जीवन-व्यवहार में रूपान्तरित करने के लिए साधना। यद्यपि शताब्दियों के प्रवाह में राजनीतिक सीमाएँ परिवर्तित होती रहीं, तथापि एक गहन सांस्कृतिक एकात्मता निरन्तर बनी रही, जो तीर्थों एवं मठों की अवधारणा, विद्वानों के दिग्विजय यात्रा, तथा भारत-भ्रमण की चिरन्तन परम्परा के माध्यम से सुदृढ़ होती रही।
भारत के प्रत्येक भूभाग में और इसके इतिहास के प्रत्येक चरण में असङ्ख्य ज्ञान-केन्द्रों तथा विद्वत् परम्पराओं का उद्भव हुआ, जिनमें से प्रत्येक ने इस विराट बौद्धिक विरासत के निर्माण में विशिष्ट योगदान दिया। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने चिन्तन को उपनिवेशवादी प्रभावों से मुक्त करें, यहाँ विकसित ज्ञान-परम्पराओं की अपार निधि—गणित, चिकित्सा, खगोलशास्त्र, दर्शन आदि—का सम्यक् बोध प्राप्त करें, तथा इन प्राचीन वैचारिक ढाँचों को नवजीवन प्रदान करें। ऐसा करते हुए ये परंपराएँ समकालीन चुनौतियों से संवाद स्थापित कर सकें और साथ ही भारत की विशिष्ट बौद्धिक दृष्टि को वैश्विक संदर्भ में सार्थक रूप से प्रस्तुत कर सकें।